गरुड़ पुराण में जीवन के कर्म, मृत्यु के बाद की स्थिति और अच्छे-बुरे कर्मों के फल का विस्तार से उल्लेख किया गया है। इस प्राचीन ग्रंथ में बताया गया है कि व्यक्ति को किन लोगों की संगति से हमेशा बचना चाहिए, क्योंकि ऐसी संगति जीवन को बर्बाद कर सकती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, चार प्रकार के लोगों की संगति जीवन में कष्ट, पतन और दुख का कारण बनती है।
गरुड़ पुराण के 16 अध्याय हैं, जिनमें कुल 18,000 श्लोक हैं। इसमें भगवान विष्णु ने स्वयं गरुड़ को बताया है कि कौन-कौन से लोग नरक जाते हैं और उन्हें कैसी यातनाएँ मिलती हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि कौन से लोग स्वर्ग के सुखों के अधिकारी होते हैं।
इस ग्रंथ में स्पष्ट किया गया है कि “अवश्यं अनुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटि शतैरपि॥” अर्थात्, प्रत्येक व्यक्ति को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। करोड़ों कल्प बीत जाएं, तब भी यह कर्म नष्ट नहीं होते, जब तक उनका फल भोगा न जाए।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि व्यक्ति की मृत्यु के समय उसके सारे अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा सामने आता है। यमराज के दूत श्रवण और श्रवणी उसके कर्मों की गवाही देते हैं। मृत्यु के बाद, केवल आत्मा और उसके कर्म ही उसके साथ जाते हैं, बाकी सब इसी लोक में रह जाता है।
इस ग्रंथ में यह भी उल्लेख है कि गलत संगति में पड़ने से व्यक्ति को जीवन में कष्ट और अंत में नरक की यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, चार तरह के लोगों की संगति से हमेशा बचना चाहिए। हालांकि, स्रोत में इन चार प्रकार के लोगों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन यह चेतावनी दी गई है कि बुरी संगति व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद परिजनों का ध्यान अक्सर मृतक की संपत्ति पर रहता है, जबकि आत्मा अपने प्रियजनों को याद कर दुःखी होती है। इसी कारण, गरुड़ पुराण सत्कर्म करने और दूसरों का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
इस ग्रंथ में यह भी कहा गया है कि “इस संसार में कोई किसी का नहीं।” हर व्यक्ति को अपने कर्म का फल स्वयं ही भोगना पड़ता है। भगवान विष्णु ने गरुड़ को बताया कि बुरी संगति और बुरे कर्म दोनों ही व्यक्ति को दुख और नरक की ओर ले जाते हैं।
गरुड़ पुराण जीवन को सही दिशा देने और सत्कर्म की ओर प्रेरित करने का संदेश देता है। इसमें यह भी बताया गया है कि समय रहते अच्छे कर्म करें, दूसरों का सम्मान करें, अन्यथा भीषण नरक के लिए तैयार रहें।
